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Friday, February 13, 2015

chain mails

Ye chain mail baba fir shuru ho gaye ...
Bhagwan ne bhi kya Indian Media ki sharan le li hai ...

"Bas 7 din baad Dekhoye MahaSoap "Bade achchhe  Lahte h ..."

Fir ek ek din kam karte jaate h...

अरे महांज्ञानी भाई कम से कम भगवान को तो बख्श दो।

भगवान् हर क्षण हमारे साथ है। उसकी कृपा भी सदा हमारे साथ है।  फिर दूसरे को sms या mail भेजने से क्या होगा ?
मैं तो कहता हूँ कि अपने मन में ही हर वक़्त उसे याद रक्खा जाये तो ही बहुत है।

Thursday, January 8, 2015

ज्ञानोदय सर्वजन हिताय

5,00,000/- की गाडी मे
कभी मिट्टी का तेल नही डालते...

क्यों ?

गाडी का इंजन खराब हो जायेगा.

5,00,000/- की गाडी की तुमको इतनी चिंता है ?

कभी मुह मे शराब, सिगरेट या गुटका डालने के पहले सोचा कि किडनी , लिवर खराब हो गया तो?

करोडो की कीमत वाले अपने इस अनमोल शरीर के इंजन की भी उतनी ही चिंता करो जितनी अपनी गाडी की करते हो.

दुनियाँ के लिए आप एक व्यक्ति हैं. लेकिन परिवार के लिए आप पूरी दुनियां हैं.

आप अपना ख्याल रखें... व्यसन से दुर रहीये....

ज्ञानोदय सर्वजन सुखा

Wednesday, December 31, 2014

माँ

एक गाँव में 10, सालका लड़का अपनी माँ के साथरहता था।माँ ने सोचा कल मेरा बेटा मेले मेंजाएगा,उसके पास10 रुपए तो हो,ये सोचकर माँ ने खेतो में कामकरके शाम तक पैसे लेआई।बेटा स्कूल से आकरबोला खाना खाकरजल्दी सो जाता हूँ, कल मेले मेंजाना है।सुबह माँ से बोला -मैं नहानेजाता हूँ,नाश्ता तैयाररखना,माँ ने रोटी बनाई,दूधअभी चूल्हे पर था,माँ ने देखा बरतन पकडने के लिएकुछ नहीं है,उसने गर्म पतीला हाथ सेउठा लिया,माँ का हाथ जलगया।बेटे ने गर्दन झुकाकर दूधरोटी खाई और मेले मेंचला गया।शाम को घर आया,तो माँ नेपूछा - मेले में क्या देखा,10रुपएका कुछ खाया कि नहीं..!!बेटा बोला -माँ आँखें बंद कर,तेरे लिए कुछलाया हूँ।माँ ने आँखें बंद की,तो बेटे ने उसकेहाथ में गर्म बरतनउठानेकेलिए लाई संडासी रख दी।अबमाँ तेरे हाथनहीं जलेंगे।माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।दोस्तों,माँ के चरणों मे स्वर्ग हैकभी उसे दुखी मत करोसब कुछ मिल जाता है,पर माँ दुबारा नहीं मिलती।माँ,मेरा गुरू,माँ कल्पतरू,माँ सुख का सागर..!!" मेरी माँ "

Wednesday, November 26, 2014

समाज की एक कड़वी हक़ीक़त

जिसके गवाह हम सब हैं, जिसके ज़िम्मेदार हम सब हैं।

यह दर्दनाक घटना एक परिवार की है। जिसमें परिवार का मुखिया, उसकी पत्नी और दो बच्चे थे। जो जैसे तैसे अपना जीवन घसीट रहे थे।

घर का मुखिया एक लम्बे अरसे से बीमार था। जो जमा पूंजी थी वह डॉक्टरों की फ़ीस और दवाखानों पर लग चुकी थी। लेकिन वह अभी भी चारपाई से लगा हुआ था। और एक दिन इसी हालत में अपने बच्चों को अनाथ कर इस दुनिया से चला गया।
रिवाज़ के अनुसार तीन दिन तक पड़ोस से खाना आता रहा, पर चौथे दिन भी वह मुसीबत का मारा परिवार खाने के इन्तजार में रहा मगर लोग अपने काम धंधों में लग चुके थे, किसी ने भी इस घर की ओर ध्यान नहीं दिया।
बच्चे अक्सर बाहर निकलकर सामने वाले सफेद मकान की चिमनी से निकलने वाले धुएं को आस लगाए देखते रहते। नादान बच्चे समझ रहे थे कि उनके लिए खाना तैयार हो रहा है। जब भी कुछ क़दमों की आहट आती उन्हें लगता कोई खाने की थाली ले आ रहा है। मगर कभी भी उनके दरवाजे पर दस्तक न हुई।
माँ तो माँ होती है, उसने घर से रोटी के कुछ सूखे टुकड़े ढूंढ कर निकाले। इन टुकड़ों से बच्चों को जैसे तैसे बहला फुसला कर सुला दिया।

अगले दिन फिर भूख सामने खड़ी थी। घर में था ही क्या जिसे बेचा जाता, फिर भी काफी देर "खोज" के बाद चार चीज़ें निकल आईं। जिन्हें बेच कर शायद दो समय के भोजन की व्यवस्था हो गई। बाद में वह पैसा भी खत्म हो गया तो जान के लाले पड़ गए। भूख से तड़पते बच्चों का चेहरा माँ से देखा नहीं गया। सातवें दिन विधवा माँ ही बड़ी सी चादर में मुँह लपेट कर मुहल्ले की पास वाली दुकान पर जा खड़ी हुई।
दुकानदार से महिला ने उधार पर कुछ राशन माँगा तो दुकानदार ने साफ इंकार ही नहीं किया बल्कि दो चार बातें भी सुना दीं। उसे खाली हाथ ही घर लौटना पड़ा। एक तो बाप के मरने से अनाथ होने का दुख और ऊपर से लगातार भूख से तड़पने के कारण उसके सात साल के बेटे की हिम्मत जवाब दे गई और वह बुखार से पीड़ित होकर चारपाई पर पड़ गया। बेटे के लिए दवा कहाँ से लाती, खाने तक का तो ठिकाना था नहीं। तीनों घर के एक कोने में सिमटे पड़े थे। माँ बुखार से आग बने बेटे के सिर पर पानी की पट्टियां रख रही थी, जबकि पाँच साल की छोटी बहन अपने छोटे हाथों से भाई के पैर दबा रही थी। अचानक वह उठी, माँ के कान से मुँह लगा कर के बोली "माँ, भाई कब मरेगा???"
माँ के दिल पर तो मानो जैसे तीर चल गया, तड़प कर उसे छाती से लिपटा लिया और पूछा "मेरी बच्ची, तुम यह क्या कह रही हो?"
बच्ची मासूमियत से बोली,
"हाँ माँ ! भाई मरेगा तो लोग खाना देने आएँगे ना???"

कृपया अपनी दौलत को धर्म के नाम पर चढ़ावा चढ़ाने की बजाय किसी असहाय भूखे को खाना खिलाकर पुण्य प्राप्त करें।
इससे सारे जहाँ के मालिक भी खुश होंगे और आप को भी सूकून मिलेगा ।
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