दूध पिला कर
मैंने तुमको बड़ा किया...
अपने बच्चे से भी छीना
पर मैंने तुमको दूध दिया🐄...
रूखी सूखी खाती थी मैं,
कभी न किसी को सताती थी मैं...🐄
कोने में पड़ जाती थी मैं,
दूध नहीं दे सकती मैं,🐄
अब तो गोबर से काम तो आती थी मैं,मेरे उपलों की आग से तूने,
भोजन अपना पकाया था...
गोबर गैस से रोशन कर के,
तेरा घर उजलाया था...🐄
क्यों मुझको बेच रहा रे,
उस कसाई के हाथों में...??
पड़ी रहूंगी इक कोने में,
मत कर लालच माँ हूँ मैं...🐄
मैं हूँ तेरे कृष्ण की प्यारी,
वह कहता था जग से न्यारी...
उसकी बंसी की धुन पर मैं,
भूली थी यह दुनिया सारी..🐄.
मत कर बेटा तू यह पाप,
अपनी माँ को न बेच आप...🐄
रूखी सूखी खा लूँगी मैं
किसी को नहीं सताऊँगी मैं
तेरे काम ही आई थी मैं
तेरे काम ही आउंगी मैं...🐄
अगर आप गौमाता से प्यार करते हैं
और आपने गौमाता का दूध पिया है
तो इस मेसेज को शेयर करके थोडा बहुत दूध का कर्ज चुकता करे....🐄...!!!!
सर्व कि एक पुकार...🐄.!
गौ हत्या अब नहीं स्वीकार....!!
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Wednesday, November 12, 2014
Friday, October 31, 2014
पिज्जा...
पत्नी ने कहा - आज धोने के लिए ज्यादा कपड़े मत निकालना…
- क्यों?? उसने कहा..
- अपनी काम वाली बाई दो दिन नहीं आएगी…
- क्यों??
- गणपति के लिए अपने नाती से मिलने बेटी के यहाँ जा रही है, बोली थी…
- ठीक है, अधिक कपड़े नहीं निकालता…
- और हाँ!!! गणपति के लिए पाँच सौ रूपए दे दूँ उसे? त्यौहार का बोनस..
- क्यों? अभी दिवाली आ ही रही है, तब दे देंगे…
- अरे नहीं बाबा!! गरीब है बेचारी, बेटी-नाती के यहाँ जा रही है, तो उसे भी अच्छा लगेगा… और इस महँगाई के दौर में उसकी पगार से त्यौहार कैसे मनाएगी बेचारी!!
- तुम भी ना… जरूरत से ज्यादा ही भावुक हो जाती हो…
- अरे नहीं… चिंता मत करो… मैं आज का पिज्जा खाने का कार्यक्रम रद्द कर देती हूँ… खामख्वाह 💵पाँच सौ रूपए उड़ जाएँगे, बासी पाव के उन आठ टुकड़ों के पीछे…
- वा, वा… क्या कहने!! हमारे मुँह से पिज्जा छीनकर बाई की थाली में??
तीन दिन बाद
… पोंछा लगाती हुई कामवाली बाई से पति ने पूछा...
- क्या बाई?, कैसी रही छुट्टी?
- बहुत बढ़िया हुई साहब… दीदी ने पाँच सौ रूपए दिए थे ना.. त्यौहार का बोनस..
- तो जा आई बेटी के यहाँ…मिल ली अपने नाती से…?
- हाँ साब… मजा आया, दो दिन में ५०० रूपए खर्च कर दिए…
- अच्छा!! मतलब क्या किया ५०० रूपए का??
- नाती के लिए १५० रूपए का शर्ट, ४० रूपए की गुड़िया, बेटी को ५० रूपए के पेढे लिए, ५० रूपए के पेढे मंदिर में प्रसाद चढ़ाया, ६० रूपए किराए के लग गए.. २५ रूपए की चूड़ियाँ बेटी के लिए और जमाई के लिए ५० रूपए का बेल्ट लिया अच्छा सा… बचे हुए ७५ रूपए नाती को दे दिए कॉपी-पेन्सिल खरीदने के लिए… झाड़ू-पोंछा करते हुए पूरा हिसाब उसकी ज़बान पर रटा हुआ था…
- ५०० रूपए में इतना कुछ??? वह आश्चर्य से मन ही मन विचार करने लगा...
उसकी आँखों के सामने आठ टुकड़े किया हुआ बड़ा सा पिज्ज़ा घूमने लगा, एक-एक टुकड़ा उसके दिमाग में हथौड़ा मारने लगा… अपने एक पिज्जा के खर्च की तुलना वह कामवाली बाई के त्यौहारी खर्च से करने लगा… पहला टुकड़ा बच्चे की ड्रेस का, दूसरा टुकड़ा पेढे का, तीसरा टुकड़ा मंदिर का प्रसाद, चौथा किराए का, पाँचवाँ गुड़िया का, छठवां टुकड़ा चूडियों का, सातवाँ जमाई के बेल्ट का और आठवाँ टुकड़ा बच्चे की कॉपी-पेन्सिल का..
आज तक उसने हमेशा पिज्जा की एक ही बाजू देखी थी, कभी पलटाकर नहीं देखा था कि पिज्जा पीछे से कैसा दिखता है… लेकिन आज कामवाली बाई ने उसे पिज्जा की दूसरी बाजू दिखा दी थी… पिज्जा के आठ टुकड़े उसे जीवन का अर्थ समझा गए थे… “जीवन के लिए खर्च” या “खर्च के लिए जीवन” का नवीन अर्थ एक झटके में उसे समझ आ गया
- क्यों?? उसने कहा..
- अपनी काम वाली बाई दो दिन नहीं आएगी…
- क्यों??
- गणपति के लिए अपने नाती से मिलने बेटी के यहाँ जा रही है, बोली थी…
- ठीक है, अधिक कपड़े नहीं निकालता…
- और हाँ!!! गणपति के लिए पाँच सौ रूपए दे दूँ उसे? त्यौहार का बोनस..
- क्यों? अभी दिवाली आ ही रही है, तब दे देंगे…
- अरे नहीं बाबा!! गरीब है बेचारी, बेटी-नाती के यहाँ जा रही है, तो उसे भी अच्छा लगेगा… और इस महँगाई के दौर में उसकी पगार से त्यौहार कैसे मनाएगी बेचारी!!
- तुम भी ना… जरूरत से ज्यादा ही भावुक हो जाती हो…
- अरे नहीं… चिंता मत करो… मैं आज का पिज्जा खाने का कार्यक्रम रद्द कर देती हूँ… खामख्वाह 💵पाँच सौ रूपए उड़ जाएँगे, बासी पाव के उन आठ टुकड़ों के पीछे…
- वा, वा… क्या कहने!! हमारे मुँह से पिज्जा छीनकर बाई की थाली में??
तीन दिन बाद
… पोंछा लगाती हुई कामवाली बाई से पति ने पूछा...
- क्या बाई?, कैसी रही छुट्टी?
- बहुत बढ़िया हुई साहब… दीदी ने पाँच सौ रूपए दिए थे ना.. त्यौहार का बोनस..
- तो जा आई बेटी के यहाँ…मिल ली अपने नाती से…?
- हाँ साब… मजा आया, दो दिन में ५०० रूपए खर्च कर दिए…
- अच्छा!! मतलब क्या किया ५०० रूपए का??
- नाती के लिए १५० रूपए का शर्ट, ४० रूपए की गुड़िया, बेटी को ५० रूपए के पेढे लिए, ५० रूपए के पेढे मंदिर में प्रसाद चढ़ाया, ६० रूपए किराए के लग गए.. २५ रूपए की चूड़ियाँ बेटी के लिए और जमाई के लिए ५० रूपए का बेल्ट लिया अच्छा सा… बचे हुए ७५ रूपए नाती को दे दिए कॉपी-पेन्सिल खरीदने के लिए… झाड़ू-पोंछा करते हुए पूरा हिसाब उसकी ज़बान पर रटा हुआ था…
- ५०० रूपए में इतना कुछ??? वह आश्चर्य से मन ही मन विचार करने लगा...
उसकी आँखों के सामने आठ टुकड़े किया हुआ बड़ा सा पिज्ज़ा घूमने लगा, एक-एक टुकड़ा उसके दिमाग में हथौड़ा मारने लगा… अपने एक पिज्जा के खर्च की तुलना वह कामवाली बाई के त्यौहारी खर्च से करने लगा… पहला टुकड़ा बच्चे की ड्रेस का, दूसरा टुकड़ा पेढे का, तीसरा टुकड़ा मंदिर का प्रसाद, चौथा किराए का, पाँचवाँ गुड़िया का, छठवां टुकड़ा चूडियों का, सातवाँ जमाई के बेल्ट का और आठवाँ टुकड़ा बच्चे की कॉपी-पेन्सिल का..
आज तक उसने हमेशा पिज्जा की एक ही बाजू देखी थी, कभी पलटाकर नहीं देखा था कि पिज्जा पीछे से कैसा दिखता है… लेकिन आज कामवाली बाई ने उसे पिज्जा की दूसरी बाजू दिखा दी थी… पिज्जा के आठ टुकड़े उसे जीवन का अर्थ समझा गए थे… “जीवन के लिए खर्च” या “खर्च के लिए जीवन” का नवीन अर्थ एक झटके में उसे समझ आ गया
Monday, September 1, 2014
खुश हूं।
जिंदगी है छोटी, हर पल में खुश हूं
काम में खुश हूं, आराम में खुश हू
काम में खुश हूं, आराम में खुश हू
आज पनीर नहीं, दाल में ही खुश हूं
आज गाड़ी नहीं, पैदल ही खुश हूं
आज गाड़ी नहीं, पैदल ही खुश हूं
दोस्तों का साथ नहीं, अकेला ही खुश हूं
आज कोई नाराज है, उसके इस अंदाज से ही खुश हूं
आज कोई नाराज है, उसके इस अंदाज से ही खुश हूं
जिस को देख नहीं सकता, उसकी आवाज से ही खुश हूं
जिसको पा नहीं सकता, उसको सोच कर ही खुश हूं
जिसको पा नहीं सकता, उसको सोच कर ही खुश हूं
बीता हुआ कल जा चुका है, उसकी मीठी याद में ही खुश हूं
आने वाले कल का पता नहीं, इंतजार में ही खुश हूं
आने वाले कल का पता नहीं, इंतजार में ही खुश हूं
हंसता हुआ बीत रहा है पल, आज में ही खुश हूं
जिंदगी है छोटी, हर पल में खुश हूं
जिंदगी है छोटी, हर पल में खुश हूं
अगर दिल को छुआ, तो जवाब देना
वरना बिना जवाब के भी खुश हूं!
वरना बिना जवाब के भी खुश हूं!
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happiness,
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