माँ संवेदना है, भावना है, अहसास है
माँ जीवन के फूलों में, खूशबू का वास है
माँ रोते हुए बच्चे का, खुशनुमा पालना है
माँ मरूस्थल में नदी या मीठा-सा झरना है
माँ लोरी है, गीत है, प्यारी-सी थाप है
माँ पूजा की थाली है, मंत्रो का जाप है
माँ आँखो का सिसकता हुआ किनारा है
माँ ममता की धारा है, गालों पर पप्पी है,
माँ बच्चों के लिए जादू की झप्पी है
माँ झुलसते दिनों में, कोयल की बोली है
माँ मेंहँदी है, कुंकम है, सिंदूर है, रोली है
माँ त्याग है, तपस्या है, सेवा है
माँ फूंक से ठंडा किया कलेवा है
माँ कलम है, दवात है, स्याही है
माँ परमात्मा की स्वयं एक गवाही है
माँ अनुष्ठान है, साधना है, जीवन का हवन है
माँ जिंदगी के मोहल्ले में आत्मा का भवन है
माँ चूड़ीवाले हाथों के, मजबूत कंधो का नाम है
माँ काशी है, काबा है, और चारों धाम है||
माँ चिन्ता है, याद है, हिचकी है
माँ बच्चे की चोट पर सिसकी है
माँ चूल्हा, धुँआ, रोटी और हाथों का छाला है
माँ जीवन की कड़वाहट में अमृत का प्याला है
माँ पृथ्वी है, जगत है, धूरी है
माँ बिना इस सृष्टि की कल्पना अधूरी है
माँ का महत्व दुनिया में कम हो नहीं सकता
माँ जैसा दुनिया में कुछ हो नहीं सकता ।
महाकवि ओम व्यास ओम जी की इन अनमोल पंग्तियों के साथ
आप सभी को मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ।
Monday, May 19, 2014
मातृ दिवस
माता पिता
जिसकी कोख से जन्म होता : वह माँ
जिसके पेट पर खेलने में मजा आता : वह पिता!
जो धारण करती : वह माँ
जो सिंचन करता : वह पिता !
जिसके स्तन से दूध पिया जाता: वह माँ
जिसकी मुंछे चुभने पर भी चुंबन लिया जाता : वह पिता!
जो गोद में लेकर सहलाती : वह माँ
जो हाथों में धर कर ऊंचा उठाता : वह पिता!
जो उंगली पकड़कर चलना सिखाती: वह माँ
जो कंधों पर लेकर दौड़ना सिखाता : वह पिता!
जो डूब-डूब गगरी करती: वह माँ
जो हर-हर गंगे करता : वह पिता!
जो आँचल तले दबाती: वह माँ
जो पिंजड़े से बाहर निकालता : वह पिता!
जो व्याकुल होती : वह माँ
जो संयम सिखाता : वह पिता!
जो आशीर्वचन जैसी: वह माँ
जो नमस्कार तुल्य : वह पिता!
जिसके सिवा जीवन नहीं : वह माँ
जिसके सिवा भविष्य नहीं: वह पिता!!
माँ
Lion Shailendra Sakhlecha ने कुछ समय पहले माँ पर एक कविता लिखी थी...
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माँ, सब अडजस्ट करती हे..
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एक जली हुई रोटी
छूटे सने हुए चांवल
जूठा पानी का ग्लास
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माँ, सब अडजस्ट करती हे..
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आँगन का कचरा
छत पर सूखते पापड
चक्की की सफाई
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माँ, सब अडजस्ट करती हे..
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बिखरी हुई रसोई
जूठे बर्तन
फटी साड़ी
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माँ, सब अडजस्ट करती हे..
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पति का गुस्सा
बेटी का नखरा
बेटे का स्वभाव
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माँ, सब अडजस्ट करती हे..
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जवानी का काम
बुढापे की सांझ
मृत्यु की बाट
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माँ, सब अडजस्ट करती हे..
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सुहाग की उम्र
उसके गम
अपना कृशकाय तन
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माँ, सब अडजस्ट करती हे..
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बहु का तिरस्कार
बेटे का वहिष्कार
अपने संस्कार
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माँ, सब अडजस्ट करती हे..
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अपने "गुणों" के दोष
विपत्ति में होश
सदा निर्दोष.....
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माँ, सब अडजस्ट करती हे..
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